मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे – शकील बदायूनी

मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे

मैं हूँ दर्द-ए-‘इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दु’आ न दे

 

मिरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी

मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे

 

मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर

ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे

 

मिरा ‘अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शो’लों का डर नहीं

मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे

 

वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ ‘शकील’ कहाँ है तू

तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे

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दर्द-ए-‘इश्क़ – प्यार में होने वाली तड़प, विरह वेदना

जाँ-ब-लब – जिसके प्राण होठों तक आ गए हों, मरने के निकट, आसन्न मृत्यु, मरणासन्न, मरणोन्मुख

चारा-गर – इलाज करने वाला, उपचारक, चिकित्सक

नवाज़िश-ए-मुख़्तसर – थोड़ी देर की मेहरबानी/उपकार

अज़्म – इरादा

शो’लों – मुसीबत रूपी आग

ख़ुम-ओ-सुबू – शराब का घड़ा (मटका) और प्याला

बज़्म – महफ़िल