
30 Jan मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे – शकील बदायूनी
मिरे हम-नफ़स मिरे हम-नवा मुझे दोस्त बन के दग़ा न दे
मैं हूँ दर्द-ए-‘इश्क़ से जाँ-ब-लब मुझे ज़िंदगी की दु’आ न दे
मिरे दाग़-ए-दिल से है रौशनी इसी रौशनी से है ज़िंदगी
मुझे डर है ऐ मिरे चारा-गर ये चराग़ तू ही बुझा न दे
मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर
ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे
मिरा ‘अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शो’लों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतिश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे
वो उठे हैं ले के ख़ुम-ओ-सुबू अरे ओ ‘शकील’ कहाँ है तू
तिरा जाम लेने को बज़्म में कोई और हाथ बढ़ा न दे
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दर्द-ए-‘इश्क़ – प्यार में होने वाली तड़प, विरह वेदना
जाँ-ब-लब – जिसके प्राण होठों तक आ गए हों, मरने के निकट, आसन्न मृत्यु, मरणासन्न, मरणोन्मुख
चारा-गर – इलाज करने वाला, उपचारक, चिकित्सक
नवाज़िश-ए-मुख़्तसर – थोड़ी देर की मेहरबानी/उपकार
अज़्म – इरादा
शो’लों – मुसीबत रूपी आग
ख़ुम-ओ-सुबू – शराब का घड़ा (मटका) और प्याला
बज़्म – महफ़िल